
बस्ती: लालगंज में प्रशासन की नाक के नीचे ‘हरा कत्लेआम’, वन माफियाओं ने सरेआम चीरा आम का सीना!
सिस्टम की मिलीभगत या माफियाराज? पसड़ा गांव में दिनदहाड़े कटी हरियाली, जिम्मेदारों ने ओढ़ी चुप्पी की चादर।
अजीत मिश्रा (खोजी)
खाकी और खादी के संरक्षण में ‘हरा शिकार’, लालगंज में कानून को ठेंगा दिखा रहे वन माफिया!
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
- लालगंज में बेखौफ कुल्हाड़ी: खाकी और खादी के संरक्षण में फल-फूल रहे वन माफिया, कौन है इनका आका?
- क्या विभाग की ‘सेटिंग’ से कट रहे हैं हरे पेड़? सूचना के बाद भी क्यों नहीं पहुंचे जिम्मेदार? कागजों पर पौधारोपण, जमीन पर उजाड़ रहे बाग; आखिर माफियाओं के सामने क्यों नतमस्तक है प्रशासन?
- पसड़ा गांव में सरेआम कटा आम का पेड़; डीएम साहब! इन बेखौफ लकड़कट्टों पर कब कसेगा कानूनी शिकंजा? लालगंज में हरियाली का विनाश, ग्रामीणों में उबाल, कार्रवाई के नाम पर ढाक के तीन पात!
- बेखौफ माफिया, लाचार प्रशासन और कटती हरियाली; पसड़ा गांव से ग्राउंड रिपोर्ट। लालगंज में माफियाओं का तांडव, सरेआम काटा हरा पेड़, मुकदमा दर्ज करने की मांग तेज।
- बस्ती में गजब का ‘ग्रीन मिशन’: एक तरफ लग रहे पौधे, दूसरी तरफ माफिया सरेआम साफ कर रहे हरे बाग! वाह रे प्रशासन! माफिया काट ले गए हरा पेड़ और जिम्मेदार कर्मचारी अब तक देख रहे हैं ‘मुहूर्त’।
बस्ती। एक तरफ सरकार ‘हरिशंकरी’ और ‘अमृत वन’ के नाम पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाकर पौधारोपण का ढोंग रच रही है, तो दूसरी तरफ बस्ती जिले के लालगंज थाना क्षेत्र का पसड़ा गांव वन माफियाओं की क्रूरता का गवाह बन रहा है। यहाँ माफियाओं की कुल्हाड़ी सिर्फ पेड़ पर नहीं, बल्कि सूबे के मुख्यमंत्री के ‘ग्रीन यूपी’ के सपनों पर चल रही है।
दिनदहाड़े ‘हरियाली का कत्ल’, जिम्मेदार बने तमाशबीन
पसड़ा गांव में माफियाओं ने दुस्साहस की सारी हदें पार करते हुए सरेआम हरे आम के पेड़ पर आरा चला दिया। ताज्जुब की बात यह है कि यह कत्लेआम किसी अंधेरी रात में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में प्रशासन की नाक के नीचे हुआ। बिना किसी विभागीय अनुमति के फलदार पेड़ों को काट दिया गया। सवाल यह उठता है कि क्या वन विभाग के कारिंदों ने अपनी आँखें बेच दी हैं या फिर माफियाओं के नोटों की खनक ने उनकी ज़मीर को खामोश कर दिया है?
सत्ता की हनक या विभाग की मिलीभगत?
सूचना मिलने के घंटों बाद भी किसी जिम्मेदार कर्मचारी का मौके पर न पहुंचना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। आखिर ये कौन से ‘सफेदपोश’ हैं जिनके संरक्षण में ये माफिया इतने बेखौफ हैं?
- क्या विभाग की मिलीभगत से हो रहा है हरियाली का विनाश?
- आखिर क्यों इन लकड़कट्टों पर नहीं कसा जा रहा कानूनी शिकंजा?
ग्रामीणों का आक्रोश: “कागजों पर हरियाली, जमीन पर खाली”
प्रशासन की इस लचर कार्यशैली से पसड़ा गांव के ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। स्थानीय लोगों का कहना है कि एक तरफ आम आदमी को अपनी सूखी लकड़ी काटने के लिए भी सौ चक्कर लगाने पड़ते हैं, वहीं माफिया बेधड़क होकर हरे बाग उजाड़ रहे हैं। ग्रामीणों ने अब सीधे तौर पर प्रशासन की नीयत पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
DM साहब! अब तो फाइल छोड़िए, संज्ञान लीजिए!
बस्ती के जिलाधिकारी और पुलिस विभाग के उच्चाधिकारियों से जनता यह पूछ रही है कि क्या इन माफियाओं पर मुकदमा दर्ज होगा? क्या ये माफिया सलाखों के पीछे जाएंगे, या फिर एक और ‘जांच’ का कोरम पूरा करके फाइल दबा दी जाएगी?
निष्कर्ष: अगर समय रहते इन वन माफियाओं और उन्हें शह देने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो वह दिन दूर नहीं जब बस्ती मंडल की पहचान सिर्फ ‘सूखे जंगलों’ के रूप में होगी। दोषियों पर तत्काल मुकदमा दर्ज कर उनकी गिरफ्तारी समय की मांग है।
बस्ती की जनता की निगाहें अब जिला प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं!
















